देवउठनी एकादशी, जिसे प्रबोधिनी एकादशी या देवोत्थान एकादशी भी कहा जाता है, हिंदू धर्म में अत्यंत पवित्र तिथि है। यह पर्व कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाया जाता है। इस दिन भगवान विष्णु चार महीने की योगनिद्रा से जाग्रत होते हैं, और इसी दिन से सभी शुभ व मांगलिक कार्यों (जैसे विवाह, गृह प्रवेश, यज्ञ आदि) की पुनः शुरुआत होती है। देवउठनी एकादशी का अर्थ है — “देवताओं का उठना” या “जागृत होना”, जो सृष्टि में पुनः शुभता, धर्म और समृद्धि का संचार करता है। एक बार देवी लक्ष्मी ने भगवान विष्णु से कहा — “हे प्रभु! आप सदा प्राणियों के कल्याण के लिए जागते रहते हैं। न आपको विश्राम है, न नींद। यदि आप विश्राम करेंगे तो मुझे भी अवसर मिलेगा सेवा करने का।” भगवान विष्णु मुस्कराए और बोले — “हे लक्ष्मी! प्रत्येक वर्ष मैं आषाढ़ शुक्ल एकादशी से लेकर कार्तिक शुक्ल एकादशी तक चार माह की योगनिद्रा में रहूँगा। इस अवधि में पृथ्वी पर वर्षा ऋतु और विश्राम का काल रहेगा।” यह कहते हुए भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग की शैया पर शयन करने चले गए। इस दिन को देवशयनी एकादशी कहा गया। चार माह बाद, जब कार्तिक शुक्ल एकादशी का दिन आया, तब सभी देवता, ऋषि, ब्रह्मा जी और लक्ष्मी जी क्षीरसागर पहुँचे। सभी ने मिलकर भगवान विष्णु से प्रार्थना की — “हे जगतपालक! अब जगिए, आपकी योगनिद्रा से समस्त शुभ कार्य रुके हुए हैं।
जब तक आप नहीं जागेंगे, तब तक पृथ्वी पर कोई भी मंगल कार्य संपन्न नहीं होगा।” तब देवी लक्ष्मी ने शंख, चक्र और कमल से भगवान विष्णु का जागरण किया। घंटा, शंख, मृदंग और वेद मंत्रों के साथ सभी ने कीर्तन किया — “उठो देव, जागो देव, विवाह करो देव!” भगवान विष्णु ने नेत्र खोले और बोले — “हे देवगण! मेरे उठने से अब पृथ्वी पर पुनः शुभ समय प्रारंभ हुआ। अब समस्त मांगलिक कार्य पुनः आरंभ किए जाएँ।” इस प्रकार देवउठनी एकादशी का पर्व आरंभ हुआ। देवउठनी एकादशी के दिन ही भगवान विष्णु का तुलसी देवी के साथ विवाह होता है। तुलसी विवाह को देवउठनी एकादशी का सबसे प्रमुख आयोजन माना जाता है। इस दिन भक्त अपने घरों और मंदिरों में शालिग्राम (विष्णु का स्वरूप) और तुलसी माता का विवाह कराते हैं। यह विवाह सृष्टि के पुनर्जागरण और धर्म के पुनः स्थापन का प्रतीक है। इस दिन व्रत और पूजा करने से व्यक्ति को मोक्ष और पुण्य प्राप्त होता है। देवउठनी एकादशी के बाद विवाह, यज्ञ, गृह प्रवेश, नामकरण आदि शुभ कार्य प्रारंभ होते हैं। जो भक्त भगवान विष्णु का प्रबोधन (जागरण) करते हैं,
उनके घर में धन, सुख और सौभाग्य का वास होता है। इस दिन तुलसी पूजन, दीपदान और कथा श्रवण करने का विशेष महत्व है।
देवउठनी एकादशी हमें यह सिखाती है कि — “हर विश्राम के बाद जागरण का समय आता है, और हर अंधकार के बाद पुनः प्रकाश फैलता है।” भगवान विष्णु का जागरण इस बात का प्रतीक है कि जीवन में धर्म, सत्य और शुभता सदा लौट आती है।
देवउठनी एकादशी केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि नए आरंभ और शुभ कार्यों के उद्घाटन का प्रतीक है। “जैसे भगवान विष्णु इस दिन जागते हैं, वैसे ही हम सभी अपने भीतर की भक्ति और सद्गुणों को जागृत करें।”