धनतेरस हिन्दू धर्म का एक प्रमुख और शुभ त्यौहार है, जो दीपावली के पाँच दिवसीय उत्सव की शुरुआत का प्रतीक है। इसे “धनत्रयोदशी” भी कहा जाता है, क्योंकि यह कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को मनाया जाता है। इस दिन धन, आरोग्य और समृद्धि के देवता भगवान धन्वंतरि और माता लक्ष्मी की विशेष पूजा की जाती है।
धनतेरस का इतिहास समुद्र मंथन की दिव्य कथा से जुड़ा हुआ है।
पौराणिक मान्यता के अनुसार, जब देवताओं और असुरों ने अमृत प्राप्ति के लिए क्षीर सागर का मंथन किया, तब चौदह अनमोल रत्नों में से तेरहवें स्थान पर भगवान धन्वंतरि प्रकट हुए।
वे अपने हाथों में अमृत से भरा कलश और औषधियों का पात्र लेकर प्रकट हुए थे।
इसी कारण इस दिन को “धन” (धन्वंतरि) और “तेरस” (त्रयोदशी) — धनतेरस कहा गया।
भगवान धन्वंतरि को आयुर्वेद के जनक और स्वास्थ्य के देवता माना जाता है। इस दिन उनकी पूजा करने से रोग, पीड़ा और दुर्भाग्य दूर होते हैं तथा जीवन में दीर्घायु और समृद्धि आती है।
समुद्र मंथन की दिव्य कथा के अनुसार एक बार देवता और असुरों के बीच युद्ध हुआ, जिसमें देवता पराजित हो गए। उनकी शक्ति कमज़ोर हो चुकी थी क्योंकि ऋषि दुर्वासा के श्राप के कारण उनका वैभव नष्ट हो गया था। तब देवताओं ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की कि उन्हें पुनः बल और अमरत्व प्रदान करें। भगवान विष्णु ने उन्हें सलाह दी कि — “यदि तुम असुरों के साथ मिलकर क्षीर सागर का मंथन करो, तो उसमें से अमृत निकलेगा, जिससे तुम पुनः अमर और शक्तिशाली हो जाओगे।”
देवताओं और असुरों ने मंदराचल पर्वत को मंथन का दंड और वासुकी नाग को रस्सी बनाया।
मंथन शुरू हुआ — देवता एक ओर और असुर दूसरी ओर। जैसे-जैसे समुद्र का मंथन हुआ, अनेक अद्भुत और दिव्य वस्तुएँ निकलती गईं — जैसे — कामधेनु गाय, ऐरावत हाथी, कल्पवृक्ष, लक्ष्मी जी, और अंत में धन्वंतरि भगवान।
समुद्र मंथन के तेरहवें रत्न के रूप में भगवान धन्वंतरि प्रकट हुए। उनके हाथों में अमृत से भरा कलश और औषधियों का पात्र था।
. वे भगवान विष्णु के अवतार माने जाते हैं और आयुर्वेद के जनक कहलाते हैं। उनके प्रकट होने का दिन था — कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि, जिसे आज हम धनतेरस के नाम से मनाते हैं।
भगवान धन्वंतरि के दर्शन से देवताओं को नई ऊर्जा और स्वास्थ्य प्राप्त हुआ। इसलिए इस दिन उनकी पूजा करने की परंपरा बनी, ताकि मानव जीवन में भी स्वास्थ्य, दीर्घायु और समृद्धि का वास रहे। धनतेरस का वास्तविक अर्थ है — “धन (आरोग्य और समृद्धि) + तेरस (त्रयोदशी का दिन)” — अर्थात् वह दिन जो जीवन में धन, स्वास्थ्य और सुख लाता है।
समुद्र मंथन की यह कथा हमें सिखाती है कि संघर्ष (मंथन) से ही अमृत (फल) प्राप्त होता है। धनतेरस केवल सोना-चाँदी खरीदने का दिन नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, ज्ञान और आशीर्वाद अर्जित करने का अवसर है। भगवान धन्वंतरि की कृपा से हर घर में आरोग्य, शांति और समृद्धि का प्रकाश फैले — यही इस कथा का सच्चा संदेश है।
एक अन्य प्रसिद्ध कथा के अनुसार — एक बार राजा हेम के पुत्र की कुंडली में यह लिखा था कि विवाह के चौथे दिन साँप के काटने से उसकी मृत्यु होगी। जब वह दिन आया, तो उसकी पत्नी ने उसे जगाए रखने के लिए दीपक जलाए, सुनहरे और चाँदी के आभूषणों का ढेर लगाया, और चारों ओर रोशनी फैलाई। जब यमराज साँप के रूप में आए, तो आभूषणों और दीयों की चमक से उनकी आँखें चौंधिया गईं, और वे बिना कुछ किए लौट गए। तब से यह परंपरा चली कि धनतेरस की रात दीप जलाने से अकाल मृत्यु नहीं होती।
धनतेरस का दिन न केवल धन-संपत्ति की प्राप्ति के लिए, बल्कि स्वास्थ्य और दीर्घायु के लिए भी अत्यंत शुभ माना जाता है। यह दिन हमें यह संदेश देता है कि “धन के साथ स्वास्थ्य भी जीवन का सबसे बड़ा धन है।”
धनतेरस केवल भौतिक धन का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह स्वास्थ्य, समृद्धि और शुभारंभ का उत्सव है। इस दिन किए गए शुभ कार्य, खरीदी और पूजा से घर में सकारात्मक ऊर्जा और लक्ष्मी का वास होता है।