डोल ग्यारस, जिसे परिवर्तिनी एकादशी और वामन एकादशी भी कहा जाता है, हिन्दू धर्म में एक विशेष धार्मिक पर्व है। यह पर्व भाद्रपद शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाया जाता है, जो आमतौर पर अगस्त या सितम्बर माह में आती है।
इस दिन भगवान विष्णु के वामन अवतार की पूजा की जाती है। इस एकादशी का नाम “डोल ग्यारस” इसलिए पड़ा क्योंकि इस दिन भगवान को डोल (पालकी/झूला) में बैठाकर शोभायात्रा निकाली जाती है।
1. विष्णु जी के वामन अवतार की स्मृति:
o इस दिन भगवान विष्णु ने वामन रूप में धरती पर अवतार लिया था।
o वामन जी ने बलि राजा से तीन पग भूमि माँगी और फिर तीनों लोकों को नाप लिया।
2. परिवर्तिनी एकादशी:
o इस एकादशी से भगवान विष्णु शेषनाग की शैय्या बदलते हैं, इसलिए इसे परिवर्तिनी एकादशी कहा जाता है।
o ऐसा माना जाता है कि भगवान विष्णु चार महीने के शयनकाल (चातुर्मास) में इस दिन करवट बदलते हैं।
3. पुण्य प्राप्ति और व्रत का महत्व:
o इस दिन व्रत रखने से पापों से मुक्ति मिलती है और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
o यह व्रत विशेष रूप से वैष्णव संप्रदाय में अत्यंत श्रद्धा से मनाया जाता है।
1. व्रत एवं उपवास:
o भक्त इस दिन निर्जला उपवास रखते हैं या फलाहार करते हैं।
o रात्रि जागरण (जागरण/भजन-कीर्तन) का आयोजन किया जाता है।
2. भगवान विष्णु की पूजा:
o वामन अवतार की प्रतिमा या चित्र की पूजा की जाती है।
o तुलसी पत्र, पंचामृत, फल, पुष्प आदि अर्पित किए जाते हैं।
3. डोल यात्रा/झांकी:
o मंदिरों में भगवान की डोल (झूला या पालकी) में शोभायात्रा निकाली जाती है।
o भगवान को सुंदर रथों में सजाकर नगर भ्रमण कराया जाता है।
• राजा बलि एक पराक्रमी और दानी असुर राजा था, जिसने तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया था।
• देवताओं ने भगवान विष्णु से सहायता मांगी।
• विष्णु जी ने वामन (बौने ब्राह्मण) रूप में जन्म लिया और बलि से भिक्षा में तीन पग भूमि मांगी।
• पहले पग में आकाश और दूसरे में पृथ्वी नाप ली, तीसरे पग के लिए बलि ने अपना सिर अर्पित कर दिया।
• विष्णु जी ने प्रसन्न होकर बलि को पाताल लोक का राजा बनाया और वचन दिया कि वे पाताल में उसके द्वारपाल बनेंगे।
मान्यताएं और लाभ:
• इस दिन व्रत और पूजा करने से व्यक्ति को दीर्घायु, धन, वैभव, संतान सुख और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
• यह दिन शुभ कार्यों की शुरुआत के लिए भी अत्यंत उत्तम माना जाता है।
• व्यापार, विवाह, गृह प्रवेश आदि जैसे कार्यों के लिए यह दिन विशेष फलदायी होता है।
डोल ग्यारस केवल एक पर्व नहीं, बल्कि भक्ति, व्रत, सेवा और त्याग का प्रतीक है। यह पर्व हमें भगवान विष्णु के वामन अवतार की विनम्रता और राजा बलि के बलिदान की याद दिलाता है। इसमें निहित आध्यात्मिक भावनाएँ आज भी लोगों को सच्चे मार्ग की प्रेरणा देती हैं।