ऋषि पंचमी एक पवित्र हिन्दू पर्व है, जो मुख्य रूप से महिलाओं द्वारा मनाया जाता है। यह व्रत विशेष रूप से शुद्धता, पवित्रता और पूर्वज ऋषियों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने के लिए किया जाता है। इस दिन सप्तऋषियों की पूजा करके उनसे क्षमा माँगी जाती है यदि जाने-अनजाने में किसी नियम का उल्लंघन हुआ हो।
ऋषि पंचमी का व्रत मुख्य रूप से महिलाओं द्वारा मासिक धर्म से संबंधित शारीरिक अशुद्धि को दूर करने के उद्देश्य से किया जाता है। मान्यता है कि माहवारी के दौरान महिलाएं कुछ धार्मिक कार्यों से दूर रहती हैं, और यदि इस दौरान कोई अशुद्धि या नियम भंग हो जाए, तो उसका प्रायश्चित ऋषि पंचमी व्रत से किया जाता है
यह पर्व सप्तऋषियों — कश्यप, अत्रि, भारद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और वशिष्ठ — के सम्मान में मनाया जाता है। माना जाता है कि इन ऋषियों ने मानवता के कल्याण के लिए धर्म, ज्ञान और संस्कृति की स्थापना की।
ऋषि पंचमी भाद्रपद शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाई जाती है। यह आमतौर पर भाद्रपद माह (अगस्त-सितंबर) में आती है, और हरतालिका तीज तथा गणेश चतुर्थी के बाद पड़ती है। यह तिथि महिलाओं के लिए विशेष धार्मिक महत्व रखती है।
1. प्रातःकाल स्नान:
व्रती ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करती हैं, और शुद्ध वस्त्र धारण करती हैं।
2. भूमि पर सप्तऋषियों की स्थापना:
किसी पवित्र स्थान पर सप्तऋषियों की मिट्टी या धातु की मूर्ति बनाकर स्थापित की जाती है।
3. पूजन सामग्री:
o दूध, दही, शहद, पंचामृत
o फूल, फल, दीप, धूप, नैवेद्य
o विशेष रूप से उत्थान (सेंधा नमक व बिना प्याज-लहसुन का भोजन)
4. पूजा विधि:
o सप्तऋषियों का ध्यान कर उनके नामों का उच्चारण करते हुए पूजा की जाती है।
o व्रती स्त्रियाँ व्रत कथा सुनती हैं और आरती करती हैं।
o दिनभर व्रत रखकर शाम को व्रत कथा के बाद भोजन ग्रहण किया जाता है।
o कुछ महिलाएँ उपवास रखती हैं तो कुछ फलाहार करती हैं।
एक बार एक ब्राह्मण परिवार में जन्मी स्त्री जब मरने के बाद कीड़ा बन गई। जब उसके पति ने इसका कारण पूछा तो ज्ञात हुआ कि उसने मासिक धर्म के दिनों में नियमों का पालन नहीं किया था। तब ऋषियों ने उसे ऋषि पंचमी व्रत का पालन करने की सलाह दी। इस व्रत से उसे पापों से मुक्ति मिली और अगले जन्म में वह मोक्ष को प्राप्त हुई। इसीलिए स्त्रियाँ यह व्रत अपने पूर्व जन्म या इस जन्म के किसी भी अनजाने अपराध से मुक्ति पाने के लिए करती हैं।
महत्व:
• यह व्रत आध्यात्मिक शुद्धि का प्रतीक है।
• नारी की गरिमा और पवित्रता को बनाए रखने में इसकी बड़ी भूमिका है।
• ऋषियों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का अवसर है।
• यह व्रत स्त्रियों को आत्म-नियंत्रण और आत्म-चिंतन की प्रेरणा देता है।