क्या आपने कभी सोचा है कि शादी में हल्दी क्यों लगाई जाती है? या फिर सात फेरे सिर्फ अग्नि के चक्कर हैं या कुछ और?
सच तो यह है कि विवाह की हर रस्म में छिपा है एक गहरा आध्यात्मिक अर्थ – जो दो आत्माओं को सिर्फ जोड़ता नहीं, बल्कि उन्हें जीवनभर साथ निभाने की शक्ति देता है। आइए, जानते हैं विवाह संस्कार की हर रस्म का महत्व और यह भी कि क्यों एक अनुभवी पंडितजी इस पवित्र बंधन को और भी शुभ बना सकते हैं।
हिंदू धर्म में मनुष्य के जीवन में सोलह संस्कार बताए गए हैं — जन्म से लेकर मृत्यु तक। इनमें विवाह संस्कार को सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि यही वह संस्कार है जो दो अलग-अलग परिवारों, दो अलग-अलग आत्माओं को एक सूत्र में बांधता है।
विवाह सिर्फ एक समारोह नहीं है। वैदिक परंपरा में यह गृहस्थ आश्रम की शुरुआत है — जहां पति-पत्नी मिलकर धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की यात्रा करते हैं। यही कारण है कि हमारे ऋषि-मुनियों ने विवाह की हर रस्म को इतनी सोच-समझ से बनाया कि आज हजारों साल बाद भी ये उतनी ही प्रासंगिक हैं।
लेकिन अफसोस की बात है कि आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हम इन रस्मों को निभाते तो हैं, पर उनका असली मतलब भूलते जा रहे हैं। तो चलिए, आज इन्हें फिर से समझते हैं।
हिंदू धर्म में मनुष्य के जीवन को 16 संस्कारों से गुजरना होता है। जन्म से लेकर मृत्यु तक, हर महत्वपूर्ण पड़ाव पर एक संस्कार होता है। इन सभी में विवाह संस्कार को सबसे महत्वपूर्ण माना गया है।
क्यों? क्योंकि विवाह सिर्फ दो लोगों की शादी नहीं है। यह दो आत्माओं का मिलन है, दो परिवारों का जुड़ाव है, और गृहस्थ आश्रम की पवित्र शुरुआत है।
वैदिक परंपरा के अनुसार, गृहस्थ आश्रम में ही मनुष्य अपने सभी कर्तव्यों को पूरा करता है – माता-पिता की सेवा, संतान का पालन-पोषण, समाज के प्रति दायित्व। इसीलिए हमारे ऋषि-मुनियों ने विवाह की हर रस्म को एक गहरे अर्थ से जोड़ा।
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हम इन रस्मों को करते तो हैं, लेकिन इनका असली मतलब भूलते जा रहे हैं। तो चलिए, एक-एक करके समझते हैं हर रस्म को।
शादी से एक-दो दिन पहले वर और वधू दोनों के घर हल्दी की रस्म होती है। परिवार के सभी सदस्य प्यार से हल्दी लगाते हैं।
हल्दी सिर्फ सुंदरता के लिए नहीं लगाई जाती। पीला रंग हिंदू धर्म में शुद्धि, समृद्धि और शुभता का प्रतीक है। विवाह जैसे पवित्र अवसर से पहले शरीर और मन दोनों की शुद्धि जरूरी मानी जाती है।
जब परिवार के लोग अपने हाथों से हल्दी लगाते हैं, तो यह उनके प्यार और आशीर्वाद का प्रतीक होता है। यह रस्म वर-वधू को बताती है कि पूरा परिवार उनके साथ है, उनकी खुशी में शामिल है।
वैज्ञानिक दृष्टि से भी हल्दी में एंटीसेप्टिक गुण होते हैं जो त्वचा को शुद्ध करते हैं और प्राकृतिक चमक देते हैं।
मेहंदी की रात शादी की सबसे रंगीन रातों में से एक होती है। दुल्हन के हाथों और पैरों में खूबसूरत मेहंदी लगाई जाती है।
परंपरा के पीछे का अर्थ:
एक खूबसूरत मान्यता है कि मेहंदी का रंग जितना गहरा होता है, पति-पत्नी का प्रेम उतना ही गहरा होता है। इसीलिए दुल्हन की मेहंदी में दूल्हे का नाम छुपाया जाता है।
मेहंदी की ठंडक शादी की भागदौड़ में मन को शांत रखती है। यह रस्म घर की महिलाओं को एक साथ लाती है – गीत गाए जाते हैं, ठहाके लगते हैं, और यादें बनती हैं जो जीवनभर साथ रहती हैं।
मेहंदी सौभाग्य और खुशहाली का प्रतीक भी मानी जाती है।
संगीत की रात वो खास मौका है जब दोनों परिवार एक-दूसरे को करीब से जानते हैं। नाच-गाना होता है, हंसी-मजाक होता है।
यह रस्म सिर्फ मनोरंजन नहीं है। यह दो परिवारों के बीच रिश्तों की नींव रखती है। जो लोग कल तक अजनबी थे, वो आज एक परिवार बन जाते हैं।
पारंपरिक गीत जैसे “बन्ना-बन्नी” पीढ़ियों से चली आ रही भावनाओं को व्यक्त करते हैं। ये गीत हमारी संस्कृति की धरोहर हैं।
हिंदू परंपरा में मामा का स्थान बहुत खास होता है। ममेरा (मायरा) वो रस्म है जिसमें मामा अपनी भांजी या भांजे को शादी के लिए विशेष उपहार देते हैं।
ममेरा यह बताता है कि विवाह सिर्फ माता-पिता की जिम्मेदारी नहीं, पूरे परिवार का सहयोग है। मामा का आशीर्वाद नए जीवन की शुरुआत के लिए शुभ माना जाता है।
इस रस्म में मामा कपड़े, गहने, और जरूरी सामान देते हैं जो वर-वधू के नए घर में काम आते हैं। यह परिवार के प्यार और एकता का खूबसूरत प्रतीक है।
मंडप वो पवित्र स्थान है जहां विवाह का मुख्य अनुष्ठान होता है। इसकी स्थापना बहुत सोच-समझकर की जाती है।
चार खंभों का रहस्य:
मंडप के चार खंभे जीवन के चार पुरुषार्थों का प्रतीक हैं:
ये चारों मिलकर एक संतुलित गृहस्थ जीवन का आधार बनते हैं।
अग्नि की स्थापना:
मंडप के केंद्र में अग्नि प्रज्वलित की जाती है। अग्नि देव को साक्षी मानकर ही सभी वचन लिए जाते हैं। यही कारण है कि विवाह को “अग्नि साक्षी” भी कहा जाता है। अग्नि पवित्रता, प्रकाश और सत्य का प्रतीक है।
कन्यादान को हिंदू धर्म में महादान कहा गया है। इससे बड़ा कोई दान नहीं माना जाता।
सोचिए, जिस बेटी को पिता ने जन्म से पाला, जिसे चलना सिखाया, जिसकी हर जिद पूरी की – उसे किसी और के हाथों में सौंपना कितना कठिन होता है।
लेकिन यही गृहस्थ धर्म है। कन्यादान में पिता अपनी बेटी का हाथ वर के हाथ में देते हुए कहते हैं – “अब तुम इसकी रक्षा करो, इसका सम्मान करो।”
कन्यादान के मंत्रों में पिता वर से तीन वचन लेते हैं कि वो उनकी बेटी को धर्म, अर्थ और काम में कभी धोखा नहीं देंगे। यह वचन पवित्र और अटूट माने जाते हैं।
यह विवाह की सबसे महत्वपूर्ण रस्म है। अग्नि के चारों ओर सात फेरे लेकर वर-वधू सात वचन लेते हैं जो उन्हें सात जन्मों के लिए बांध देते हैं।
हर फेरे का विशेष अर्थ:
पहला फेरा – अन्न और पोषण
वर वचन देता है कि वो परिवार के भोजन और पोषण की जिम्मेदारी लेगा। वधू वचन देती है कि वो घर का अन्न-जल संभालेगी। यह फेरा जीवन की मूलभूत जरूरतों के प्रति समर्पण है।
दूसरा फेरा – शक्ति और स्वास्थ्य
दोनों वचन लेते हैं कि वो एक-दूसरे को शारीरिक और मानसिक रूप से मजबूत बनाएंगे। सुख-दुख में साथ खड़े रहेंगे, कभी अकेला नहीं छोड़ेंगे।
तीसरा फेरा – धन और समृद्धि
यह फेरा आर्थिक जिम्मेदारियों का है। वर वचन देता है कि वो परिवार की आर्थिक सुरक्षा करेगा। वधू वचन देती है कि वो धन का सदुपयोग करेगी, फिजूलखर्ची नहीं करेगी।
चौथा फेरा – परिवार और संतान
इस फेरे में संतान और परिवार के प्रति कर्तव्य का वचन लिया जाता है। दोनों मिलकर अपने बच्चों को अच्छे संस्कार देने का संकल्प लेते हैं।
पांचवां फेरा – सुख-समृद्धि
प्राचीन काल में पशुधन संपत्ति का प्रतीक था। आज के संदर्भ में यह भौतिक सुखों और संपत्ति की रक्षा का वचन है।
छठा फेरा – हर मौसम में साथ
जीवन में अच्छे और बुरे समय आते हैं, जैसे मौसम बदलते हैं। इस फेरे में वचन लिया जाता है कि हर परिस्थिति में, चाहे खुशी हो या गम, साथ निभाएंगे।
सातवां फेरा – मित्रता और आजीवन साथ
यह सबसे महत्वपूर्ण फेरा है। इसमें वचन लिया जाता है कि पति-पत्नी होने से पहले दोनों एक-दूसरे के सबसे अच्छे मित्र होंगे। विश्वास रखेंगे, सम्मान करेंगे, और सात जन्मों तक साथ निभाएंगे।
सातवें फेरे के बाद विवाह संपन्न माना जाता है। इसीलिए कहते हैं – “सात फेरे, सात जन्म।”
फेरों के बाद वर वधू की मांग में सिंदूर भरता है और मंगलसूत्र पहनाता है।
इनका अर्थ: सिंदूर का लाल रंग शक्ति और सौभाग्य का प्रतीक है। मांग में सिंदूर यह दर्शाता है कि यह स्त्री अब विवाहित है और उसके जीवनसाथी उसकी रक्षा के लिए प्रतिबद्ध हैं।
मंगलसूत्र पति-पत्नी के बंधन का प्रतीक है। इसकी दो लड़ियां दो व्यक्तियों को दर्शाती हैं जो अब एक साथ जुड़ गए हैं।
विदाई शादी का सबसे भावुक पल होता है। बेटी अपना घर छोड़कर नए घर जाती है।
एक खूबसूरत परंपरा: विदाई के समय बेटी पीछे मुड़कर चावल फेंकती है। इसका अर्थ है कि वो अपने मायके की समृद्धि वापस कर रही है। वो खाली हाथ नहीं जा रही, बल्कि माता-पिता का आशीर्वाद, संस्कार और प्यार साथ ले जा रही है।
यह पल कठिन होता है, लेकिन यही जीवन का सुंदर सफर है।
विवाह सिर्फ एक दिन का उत्सव नहीं, बल्कि जीवनभर के रिश्ते की नींव है। जब यह नींव सही विधि-विधान, शुद्ध मंत्रोच्चारण और पूर्ण रीति-रिवाजों से रखी जाती है, तो रिश्ता भी मजबूत होता है।
हमारी परंपराओं में गहरी समझदारी है। हर रस्म का एक मतलब है, हर मंत्र में एक शक्ति है। बस जरूरत है इन्हें समझने और सही तरीके से निभाने की।
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क्योंकि जब रस्में सही हों, तो रिश्ते भी मजबूत होते हैं।