सर्व पितृ अमावस्या (जिसे महालय अमावस्या भी कहा जाता है) यह पितृ पक्ष का अंतिम दिन होता है।
यह अमावस्या तिथि अश्विन मास (भाद्रपद पूर्णिमा के बाद) आती है और पितरों को श्रद्धांजलि, तर्पण और पिंडदान के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है।
क्या विशेष है इस दिन में?
• यह तिथि उन सभी पूर्वजों (पितरों) के लिए श्राद्ध करने की तिथि है जिनकी मृत्यु की तिथि ज्ञात नहीं है, या किसी कारणवश उनके लिए पिंडदान न किया जा सका हो।
• इसलिए इसे “सर्व पितरों” की अमावस्या कहा जाता है।
• इस दिन किया गया श्राद्ध, तर्पण और दान सभी ज्ञात-अज्ञात, सगोत्र-असगोत्र, पीढ़ियों के पितरों तक पहुँचता है।
पौराणिक मान्यता:
• मान्यता है कि यमराज इस दिन पितरों को पृथ्वी पर भेजते हैं ताकि वे अपने वंशजों द्वारा किए गए श्राद्ध और तर्पण को स्वीकार कर सकें।
• गरुड़ पुराण में वर्णन है कि:
“अज्ञात तिथि मृतानां च सर्वेषां पितृणां तु।
अमावास्यां विशेषेण श्राद्धं कुर्याद् अतन्द्रितः॥”
यानी, जिन पूर्वजों की मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं है, उनके लिए अमावस्या को विशेष रूप से श्राद्ध करना चाहिए।
सर्व पितृ अमावस्या को क्या करना चाहिए?
1. श्राद्ध और तर्पण करें:
• कुश, तिल और जल से पितरों का तर्पण करें।
• पिंडदान करें — चावल, तिल और घी से बने पिंडों को बहते जल में अर्पित करें।
2. ब्राह्मण भोजन कराएँ:
• ब्राह्मण को बुलाकर उन्हें सात्विक भोजन कराएँ, वस्त्र, दक्षिणा आदि दें।
3. गाय, कौआ, कुत्ता, और गायत्री स्वरूप कन्याओं को भोजन दें:
• ये सभी पितरों के प्रतीक माने जाते हैं।
4. दान करें:
• जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र, तिल, गुड़, दक्षिणा आदि दान करें।
क्यों करें सर्व पितृ अमावस्या का श्राद्ध?
मृत्यु तिथि न जानने पर सभी पितरों को स्मरण और तृप्ति का अवसर
पितृ दोष निवारण जीवन की बाधाएं, संतानहीनता, दरिद्रता आदि दूर होती हैं
पुण्य लाभ यह दिन कई यज्ञों के बराबर पुण्य देता है
आत्मिक संतुलन पितरों को शांति मिलती है और वंशजों को आशीर्वाद
निष्कर्ष:
सर्व पितृ अमावस्या एक ऐसा पावन दिन है जो हमें हमारे पूर्वजों के ऋण को चुकाने और उनके प्रति श्रद्धा प्रकट करने का अवसर देता है।
इस दिन किया गया श्राद्ध और तर्पण जीवन की अनेक बाधाओं को दूर करता है और पितरों का आशीर्वाद प्रदान करता है।
इस दिन ब्राह्मण भोजन क्यों कराना चाहिए?
ब्राह्मण को भोजन = पितरों को तृप्ति
• शास्त्रों के अनुसार, जब ब्राह्मण को श्रद्धा और नियमपूर्वक भोजन कराया जाता है, तो वह भोजन पितरों तक आत्मिक रूप से पहुँचता है।
• श्लोक:
“ब्राह्मणेभ्यः प्रदत्तं हि पितृभ्यो ह्युपपद्यते।”
(ब्राह्मण को दिया गया दान और भोजन पितरों को प्राप्त होता है।)
सर्व पितृ अमावस्या पर ब्राह्मण भोजन और दान करने से पितृ दोष शांत होता है और घर में सुख-शांति आती है।
• ब्राह्मण भोजन कराना पूर्वजों के लिए “श्रद्धांजलि” है।
• यह पितृ ऋण से मुक्त होने का धार्मिक और आत्मिक माध्यम है।
पुण्य फल और आत्मिक संतुलन:
• इस दिन ब्राह्मण भोजन कराने से मिलता है:
o सात पीढ़ियों तक के पितरों को तृप्ति,
गरुड़ पुराण और धर्मशास्त्रों का समर्थन:
“यदि भोज्यं न देयं स्यात् तर्पणं निष्फलं स्मृतम्।”
— गरुड़ पुराण
अर्थ: यदि ब्राह्मण भोजन न कराया जाए, तो केवल जल तर्पण का भी पूरा फल नहीं मिलता।
कैसे कराएँ ब्राह्मण भोजन?
1. पवित्रता और श्रद्धा से कराएँ।
2. भोजन से पहले ब्राह्मण को पैर धोकर, तिलक लगाकर सम्मान दें।
3. सात्विक और शुद्ध भोजन कराएँ – बिना प्याज-लहसुन के।
4. भोजन के बाद यथाशक्ति दक्षिणा, वस्त्र, फल आदि का दान करें।
5. अंत में पितरों का नाम लेकर तर्पण व प्रार्थना करें।
निष्कर्ष:
सर्व पितृ अमावस्या पर ब्राह्मण भोजन कराना न केवल एक धार्मिक कर्म है, बल्कि यह पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता, पितृ दोष निवारण, और पुण्य अर्जन का सर्वोत्तम उपाय है।यह हमारे जीवन में शांति, समृद्धि और आत्मिक संतुलन लाता है।
